इस प्रकार जब उन भयानक असुरोंने बहुत बड़ी मायाकी सृष्टि की और स्वयं अपनी मायाके प्रभावसे छिप रहे—न दीखनेके कारण उनपर प्रहार भी नहीं किया जा सकता था तब देवताओंके सैनिक बहुत दुःखी हो गये॥ ५२॥✎ 725
एवं दैत्यैर्महामायैरलक्ष्यगतिभीषणैः।
सृज्यमानासु मायासु विषेदुः सुरसैनिकाः॥ ५२
इस प्रकार जब उन भयानक असुरोंने बहुत बड़ी मायाकी सृष्टि की और स्वयं अपनी मायाके प्रभावसे छिप रहे—न दीखनेके कारण उनपर प्रहार भी नहीं किया जा सकता था तब देवताओंके सैनिक बहुत दुःखी हो गये॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.10.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 956) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/10/52/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)