थोड़ी ही देरमें ऐसा जान पड़ा कि प्रबल आँधीके थपेड़ोंसे समुद्रमें बड़ी-बड़ी लहरें और भयानक भँवर उठ रहे हैं और वह अपनी मर्यादा छोड़कर चारों ओरसे देवसेनाको घेरता हुआ उमड़ा आ रहा है॥ ५१॥
ततः समुद्र उद्वेलः सर्वतः प्रत्यदृश्यत।
प्रचण्डवातैरुद्धूततरङ्गावर्तभीषणः ॥ ५१
थोड़ी ही देरमें ऐसा जान पड़ा कि प्रबल आँधीके थपेड़ोंसे समुद्रमें बड़ी-बड़ी लहरें और भयानक भँवर उठ रहे हैं और वह अपनी मर्यादा छोड़कर चारों ओरसे देवसेनाको घेरता हुआ उमड़ा आ रहा है॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.10.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 956) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/10/51/