॥ श्रीहरिः ॥
वृषाकपिस्तु जम्भेन महिषेण विभावसुः।
इल्वलः सह वातापिर्ब्रह्मपुत्रैररिन्दम॥ ३२
vṛṣākapistu jambhena mahiṣeṇa vibhāvasuḥ|
ilvalaḥ saha vātāpirbrahmaputrairarindama|| 32
अर्थ
परीक्षित्! जम्भासुरसे महादेवजीकी, महिषासुरसे अग्निदेवकी और वातापि तथा इल्वलसे ब्रह्माके पुत्र मरीचि आदिकी ठन गयी॥ ३२॥✎ 1987
वृषाकपिस्तु जम्भेन महिषेण विभावसुः।
इल्वलः सह वातापिर्ब्रह्मपुत्रैररिन्दम॥ ३२
परीक्षित्! जम्भासुरसे महादेवजीकी, महिषासुरसे अग्निदेवकी और वातापि तथा इल्वलसे ब्रह्माके पुत्र मरीचि आदिकी ठन गयी॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.10.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 954) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/10/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1987 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): महोदवजीकी → महादेवजीकी