श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.6

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

स तत्करस्पर्शधुताखिलाशुभः

सपद्यभिव्यक्तपरात्मदर्शनः ।

तत्पादपद्मं हृदि निर्वृतो दधौ

हृष्यत्तनुः क्लिन्‍नहृदश्रुलोचनः॥ ६

sa tatkarasparśadhutākhilāśubhaḥ

sapadyabhivyaktaparātmadarśanaḥ |

tatpādapadmaṃ hṛdi nirvṛto dadhau

hṛṣyattanuḥ klinnahṛdaśrulocanaḥ|| 6

अर्थ

भगवान्‌के करकमलोंका स्पर्श होते ही उनके बचे-खुचे अशुभ संस्कार भी झड़ गये। तत्काल उन्हें परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार हो गया। उन्होंने बड़े प्रेम और आनन्दमें मग्न होकर भगवान्‌के चरणकमलोंको अपने हृदयमें धारण किया। उस समय उनका सारा शरीर पुलकित हो गया, हृदयमें प्रेमकी धारा प्रवाहित होने लगी और नेत्रोंसे आनन्दाश्रु झरने लगे॥ ६॥✎ 619

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #619 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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