श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.53

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

मामप्रीणत आयुष्मन्दर्शनं दुर्लभं हि मे।

दृष्ट्वा मां न पुनर्जन्तुरात्मानं तप्तुमर्हति॥ ५३

māmaprīṇata āyuṣmandarśanaṃ durlabhaṃ hi me|

dṛṣṭvā māṃ na punarjanturātmānaṃ taptumarhati|| 53

अर्थ

आयुष्मन्! जो मुझे प्रसन्‍न नहीं कर लेता, उसे मेरा दर्शन मिलना बहुत ही कठिन है। परन्तु जब मेरे दर्शन हो जाते हैं, तब फिर प्राणीके हृदयमें किसी प्रकारकी जलन नहीं रह जाती॥ ५३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें