prahrāda bhadra bhadraṃ te prīto'haṃ te'surottama|
varaṃ vṛṇīṣvābhimataṃ kāmapūro'smyahaṃ nṛṇām|| 52
अर्थ
श्रीनृसिंहभगवान्ने कहा—परम कल्याण-स्वरूप प्रह्लाद! तुम्हारा कल्याण हो। दैत्यश्रेष्ठ! मैं तुमपर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम्हारी जो अभिलाषा हो, मुझसे माँग लो। मैं जीवोंकी इच्छाओंको पूर्ण करनेवाला हूँ॥ ५२॥✎ 623
प्रह्राद भद्र भद्रं ते प्रीतोऽहं तेऽसुरोत्तम।
वरं वृणीष्वाभिमतं कामपूरोऽस्म्यहं नृणाम्॥ ५२
श्रीनृसिंहभगवान्ने कहा—परम कल्याण-स्वरूप प्रह्लाद! तुम्हारा कल्याण हो। दैत्यश्रेष्ठ! मैं तुमपर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम्हारी जो अभिलाषा हो, मुझसे माँग लो। मैं जीवोंकी इच्छाओंको पूर्ण करनेवाला हूँ॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.9.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 866) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/9/52/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#623 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीनृसिंहभगवान् ने → श्रीनृसिंहभगवान्ने