श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.35

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

स त्वात्मयोनिरतिविस्मित आस्थितोऽब्जं

कालेन तीव्रतपसा परिशुद्धभावः।

त्वामात्मनीश भुवि गन्धमिवातिसूक्ष्मं

भूतेन्द्रियाशयमये विततं ददर्श॥ ३५

sa tvātmayonirativismita āsthito'bjaṃ

kālena tīvratapasā pariśuddhabhāvaḥ|

tvāmātmanīśa bhuvi gandhamivātisūkṣmaṃ

bhūtendriyāśayamaye vitataṃ dadarśa|| 35

अर्थ

ब्रह्माको बड़ा आश्‍चर्य हुआ। वे हारकर कमलपर बैठ गये। बहुत समय बीतनेपर तीव्र तपस्या करनेसे जब उनका हृदय शुद्ध हो गया, तब उन्हें भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरणरूप अपने शरीरमें ही ओत-प्रोतरूपसे स्थित आपके सूक्ष्मरूपका साक्षात्कार हुआ—ठीक वैसे ही जैसे पृथ्वीमें व्याप्त उसकी अति सूक्ष्म तन्मात्रा गन्धका होता है॥ ३५॥

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