॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.9.34
तत्सम्भवः कविरतोऽन्यदपश्यमान-
स्त्वां बीजमात्मनि ततं स्वबहिर्विचिन्त्य।
नाविन्ददब्दशतमप्सु निमज्जमानो
जातेऽङ्कुरे कथमु होपलभेत बीजम्॥ ३४
tatsambhavaḥ kavirato'nyadapaśyamāna-
stvāṃ bījamātmani tataṃ svabahirvicintya|
nāvindadabdaśatamapsu nimajjamāno
jāte'ṅkure kathamu hopalabheta bījam|| 34
अर्थ
उसपर सूक्ष्मदर्शी ब्रह्माजी प्रकट हुए। जब उन्हें कमलके सिवा और कुछ भी दिखायी न पड़ा, तब अपनेमें बीजरूपसे व्याप्त आपको वे न जान सके और आपको अपनेसे बाहर समझकर जलके भीतर घुसकर सौ वर्षतक ढूँढ़ते रहे। परन्तु वहाँ उन्हें कुछ नहीं मिला। यह ठीक ही है, क्योंकि अंकुर उग आनेपर उसमें व्याप्त बीजको कोई बाहर अलग कैसे देख सकता है॥ ३४॥✎ 1917