॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.9.23
दृष्टा मया दिवि विभोऽखिलधिष्ण्यपाना-
मायुः श्रियो विभव इच्छति याञ्जनोऽयम्।
येऽस्मत्पितुः कुपितहासविजृम्भितभ्रू-
विस्फूर्जितेन लुलिताः स तु ते निरस्तः॥ २३
dṛṣṭā mayā divi vibho'khiladhiṣṇyapānā-
māyuḥ śriyo vibhava icchati yāñjano'yam|
ye'smatpituḥ kupitahāsavijṛmbhitabhrū-
visphūrjitena lulitāḥ sa tu te nirastaḥ|| 23
अर्थ
भगवन्! जिनके लिये संसारीलोग बड़े लालायित रहते हैं, स्वर्गमें मिलनेवाली समस्त लोकपालोंकी वह आयु, लक्ष्मी और ऐश्वर्य मैंने खूब देख लिये। जिस समय मेरे पिता तनिक क्रोध करके हँसते थे और उससे उनकी भौंहें थोड़ी टेढ़ी हो जाती थीं, तब उन स्वर्गकी सम्पत्तियोंके लिये कहीं ठिकाना नहीं रह जाता था, वे लुटती फिरती थीं। किन्तु आपने मेरे उन पिताको भी मार डाला॥ २३॥✎ 2002