श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.22

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

स त्वं हि नित्यविजितात्मगुणः स्वधाम्ना

कालो वशीकृतविसृज्यविसर्गशक्तिः।

चक्रे विसृष्टमजयेश्‍वर षोडशारे

निष्पीड्यमानमुपकर्ष विभो प्रपन्‍नम्॥ २२

sa tvaṃ hi nityavijitātmaguṇaḥ svadhāmnā

kālo vaśīkṛtavisṛjyavisargaśaktiḥ|

cakre visṛṣṭamajayeśvara ṣoḍaśāre

niṣpīḍyamānamupakarṣa vibho prapannam|| 22

अर्थ

सर्वशक्तिमान् प्रभो! माया इस सोलह अरोंवाले संसारचक्रमें डालकर ईखके समान मुझे पेर रही है। आप अपनी चैतन्यशक्तिसे बुद्धिके समस्त गुणोंको सर्वदा पराजित रखते हैं और कालरूपसे सम्पूर्ण साध्य और साधनोंको अपने अधीन रखते हैं। मैं आपकी शरणमें आया हूँ, आप मुझे इससे बचाकर अपनी सन्‍निधिमें खींच लीजिये॥ २२॥✎ 2002

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2002 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): टेढ़ीं → टेढ़ी

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