श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.11

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

नैवात्मनः प्रभुरयं निजलाभपूर्णो

मानं जनादविदुषः करुणो वृणीते।

यद् यज्जनो भगवते विदधीत मानं

तच्चात्मने प्रतिमुखस्य यथा मुखश्रीः॥ ११

naivātmanaḥ prabhurayaṃ nijalābhapūrṇo

mānaṃ janādaviduṣaḥ karuṇo vṛṇīte|

yad yajjano bhagavate vidadhīta mānaṃ

taccātmane pratimukhasya yathā mukhaśrīḥ|| 11

अर्थ

सर्वशक्तिमान् प्रभु अपने स्वरूपके साक्षात्कारसे ही परिपूर्ण हैं। उन्हें अपने लिये क्षुद्र पुरुषोंसे पूजा ग्रहण करनेकी आवश्यकता नहीं है। वे करुणावश ही भोले भक्तोंके हितके लिये उनके द्वारा की हुई पूजा स्वीकार कर लेते हैं। जैसे अपने मुखका सौन्दर्य दर्पणमें दीखनेवाले प्रतिबिम्बको भी सुन्दर बना देता है, वैसे ही भक्त भगवान्‌के प्रति जो-जो सम्मान प्रकट करता है, वह उसे ही प्राप्त होता है॥ ११॥✎ 621

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #621 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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