॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.9.10
विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ-
पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम्।
मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थ-
प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः॥ १०
viprād dviṣaḍguṇayutādaravindanābha-
pādāravindavimukhācchvapacaṃ variṣṭham|
manye tadarpitamanovacanehitārtha-
prāṇaṃ punāti sa kulaṃ na tu bhūrimānaḥ|| 10
अर्थ
मेरी समझसे इन बारह गुणोंसे युक्त ब्राह्मण भी यदि भगवान् कमलनाभके चरणकमलोंसे विमुख हो तो उससे वह चाण्डाल श्रेष्ठ है, जिसने अपने मन, वचन, कर्म, धन और प्राण भगवान्के चरणोंमें समर्पित कर रखे हैं; क्योंकि वह चाण्डाल तो अपने कुलतकको पवित्र कर देता है और बड़प्पनका अभिमान रखनेवाला वह ब्राह्मण अपनेको भी पवित्र नहीं कर सकता॥ १०॥✎ 621