वैतालिकोंने कहा—भगवन्! बड़ी-बड़ी सभाओं और ज्ञानयज्ञोंमें आपके निर्मल यशका गान करके हम बड़ी प्रतिष्ठा-पूजा प्राप्त करते थे। इस दुष्टने हमारी वह आजीविका ही नष्ट कर दी थी। बड़े सौभाग्यकी बात है कि महारोगके समान इस दुष्टको आपने जड़मूलसे उखाड़ दिया॥ ५४॥
सभासु सत्रेषु तवामलं यशो
गीत्वा सपर्यां महतीं लभामहे।
यस्तां व्यनैषीद् भृशमेष दुर्जनो
दिष्ट्या हतस्ते भगवन्यथाऽऽमयः॥ ५४
वैतालिकोंने कहा—भगवन्! बड़ी-बड़ी सभाओं और ज्ञानयज्ञोंमें आपके निर्मल यशका गान करके हम बड़ी प्रतिष्ठा-पूजा प्राप्त करते थे। इस दुष्टने हमारी वह आजीविका ही नष्ट कर दी थी। बड़े सौभाग्यकी बात है कि महारोगके समान इस दुष्टको आपने जड़मूलसे उखाड़ दिया॥ ५४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.8.54 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 856) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/8/54/