श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.21

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

करालदंष्ट्रं करवालचञ्चल-

क्षुरान्तजिह्वं भ्रुकुटीमुखोल्बणम्।

स्तब्धोर्ध्वकर्णं गिरिकन्दराद‍्भुत-

व्यात्तास्यनासं हनुभेदभीषणम्॥ २१

karāladaṃṣṭraṃ karavālacañcala-

kṣurāntajihvaṃ bhrukuṭīmukholbaṇam|

stabdhordhvakarṇaṃ girikandarādbhuta-

vyāttāsyanāsaṃ hanubhedabhīṣaṇam|| 21

अर्थ

दाढ़ें बड़ी विकराल थीं। तलवारकी तरह लपलपाती हुई छूरेकी धारके समान तीखी जीभ थी। टेढ़ी भौंहोंसे उनका मुख और भी दारुण हो रहा था। कान निश्‍चल एवं ऊपरकी ओर उठे हुए थे। फूली हुई नासिका और खुला हुआ मुँह पहाड़की गुफाके समान अद्भुत जान पड़ता था। फटे हुए जबड़ोंसे उसकी भयंकरता बहुत बढ़ गयी थी॥ २१॥✎ 607

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #607 शब्दोंके बीचका स्थान: नृसिंहभगवान् पर → नृसिंहभगवान्‌पर

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