श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.20

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

मीमांसमानस्य समुत्थितोऽग्रतो

नृसिंहरूपस्तदलं भयानकम्।

प्रतप्तचामीकरचण्डलोचनं

स्फुरत्सटाकेसरजृम्भिताननम् ॥ २०

mīmāṃsamānasya samutthito'grato

nṛsiṃharūpastadalaṃ bhayānakam|

prataptacāmīkaracaṇḍalocanaṃ

sphuratsaṭākesarajṛmbhitānanam || 20

अर्थ

जिस समय हिरण्यकशिपु इस उधेड़-बुनमें लगा हुआ था, उसी समय उसके बिलकुल सामने ही नृसिंहभगवान् खड़े हो गये। उनका वह रूप अत्यधिक भयावना था। तपाये हुए सोनेके समान पीली-पीली भयानक आँखें थीं। जँभाई लेनेसे गरदनके बाल इधर-उधर लहरा रहे थे॥ २०॥✎ 607

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #607 शब्दोंके बीचका स्थान: नृसिंहभगवान् पर → नृसिंहभगवान्‌पर

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