जिस समय हिरण्यकशिपु इस उधेड़-बुनमें लगा हुआ था, उसी समय उसके बिलकुल सामने ही नृसिंहभगवान् खड़े हो गये। उनका वह रूप अत्यधिक भयावना था। तपाये हुए सोनेके समान पीली-पीली भयानक आँखें थीं। जँभाई लेनेसे गरदनके बाल इधर-उधर लहरा रहे थे॥ २०॥✎ 607
मीमांसमानस्य समुत्थितोऽग्रतो
नृसिंहरूपस्तदलं भयानकम्।
प्रतप्तचामीकरचण्डलोचनं
स्फुरत्सटाकेसरजृम्भिताननम् ॥ २०
जिस समय हिरण्यकशिपु इस उधेड़-बुनमें लगा हुआ था, उसी समय उसके बिलकुल सामने ही नृसिंहभगवान् खड़े हो गये। उनका वह रूप अत्यधिक भयावना था। तपाये हुए सोनेके समान पीली-पीली भयानक आँखें थीं। जँभाई लेनेसे गरदनके बाल इधर-उधर लहरा रहे थे॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.8.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 850) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/8/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#607 शब्दोंके बीचका स्थान: नृसिंहभगवान् पर → नृसिंहभगवान्पर