श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.3

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

यत्तत्र गुरुणा प्रोक्तं शुश्रुवेऽनु पपाठ च।

न साधु मनसा मेने स्वपरासद्ग्रहाश्रयम्॥ ३

yattatra guruṇā proktaṃ śuśruve'nu papāṭha ca|

na sādhu manasā mene svaparāsadgrahāśrayam|| 3

अर्थ

प्रह्लाद गुरुजीका पढ़ाया हुआ पाठ सुन लेते थे और उसे ज्यों-का-त्यों उन्हें सुना भी दिया करते थे। किन्तु वे उसे मनसे अच्छा नहीं समझते थे। क्योंकि उस पाठका मूल आधार था अपने और परायेका झूठा आग्रह॥ ३॥

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