श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.13

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

स एष आत्मा स्वपरेत्यबुद्धिभि-

र्दुरत्ययानुक्रमणो निरूप्यते।

मुह्यन्ति यद्वर्त्मनि वेदवादिनो

ब्रह्मादयो ह्येष भिनत्ति मे मतिम्॥ १३

sa eṣa ātmā svaparetyabuddhibhi-

rduratyayānukramaṇo nirūpyate|

muhyanti yadvartmani vedavādino

brahmādayo hyeṣa bhinatti me matim|| 13

अर्थ

वही परमात्मा यह आत्मा है। अज्ञानीलोग अपने और परायेका भेद करके उसीका वर्णन किया करते हैं। उनका न जानना भी ठीक ही है; क्योंकि उसके तत्त्वको जानना बहुत कठिन है और ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े वेदज्ञ भी उसके विषयमें मोहित हो जाते हैं। वही परमात्मा आपलोगोंके शब्दोंमें मेरी बुद्धि ‘बिगाड़’ रहा है॥ १३॥✎ 587

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #587 शब्दोंके बीचका स्थान: चक्रपाणिभगवान् की → चक्रपाणिभगवान्‌की

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