इस भावसे अपनी इन्द्रियोंका संयम और मनको समाहित करके उन लोगोंने खाना-पीना और सोना छोड़ दिया तथा निर्मल हृदयसे भगवान्की आराधना की॥ २३॥✎ 582583
इति ते संयतात्मानः समाहितधियोऽमलाः।
उपतस्थुर्हृषीकेशं विनिद्रा वायुभोजनाः॥ २३
इस भावसे अपनी इन्द्रियोंका संयम और मनको समाहित करके उन लोगोंने खाना-पीना और सोना छोड़ दिया तथा निर्मल हृदयसे भगवान्की आराधना की॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.4.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 825) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/4/23/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)