श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.23

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

इति ते संयतात्मानः समाहितधियोऽमलाः।

उपतस्थुर्हृषीकेशं विनिद्रा वायुभोजनाः॥ २३

iti te saṃyatātmānaḥ samāhitadhiyo'malāḥ|

upatasthurhṛṣīkeśaṃ vinidrā vāyubhojanāḥ|| 23

अर्थ

इस भावसे अपनी इन्द्रियोंका संयम और मनको समाहित करके उन लोगोंने खाना-पीना और सोना छोड़ दिया तथा निर्मल हृदयसे भगवान्‌की आराधना की॥ २३॥✎ 582 583

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #582 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #583 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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