श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.22

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तस्यै नमोऽस्तु काष्ठायै यत्रात्मा हरिरीश्‍वरः।

यद्गत्वा न निवर्तन्ते शान्ताः संन्यासिनोऽमलाः॥ २२

tasyai namo'stu kāṣṭhāyai yatrātmā harirīśvaraḥ|

yadgatvā na nivartante śāntāḥ saṃnyāsino'malāḥ|| 22

अर्थ

(उन्होंने मन-ही-मन कहा—) ‘जहाँ सर्वात्मा जगदीश्‍वर श्रीहरि निवास करते हैं और जिसे प्राप्त करके शान्त एवं निर्मल संन्यासी महात्मा फिर लौटते नहीं, भगवान्‌के उस परम धामको हम नमस्कार करते हैं’॥ २२॥✎ 582 583

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #582 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #583 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें