श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.3.27

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

आत्मना त्रिवृता चेदं सृजत्यवति लुम्पति।

रजः सत्त्वतमोधाम्ने पराय महते नमः॥ २७

ātmanā trivṛtā cedaṃ sṛjatyavati lumpati|

rajaḥ sattvatamodhāmne parāya mahate namaḥ|| 27

अर्थ

आप ही अपने त्रिगुणमय रूपसे इसकी रचना, रक्षा और संहार करते हैं। आप रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणके आश्रय हैं। आप ही सबसे परे और महान् हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २७॥

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