श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.3.25

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

उत्थाय प्राञ्जलिः प्रह्व ईक्षमाणो दृशा विभुम्।

हर्षाश्रुपुलकोद्भेदो गिरा गद्गदयागृणात्॥ २५

utthāya prāñjaliḥ prahva īkṣamāṇo dṛśā vibhum|

harṣāśrupulakodbhedo girā gadgadayāgṛṇāt|| 25

अर्थ

फिर अंजलि बाँधकर नम्रभावसे खड़ा हुआ और बड़े प्रेमसे अपने निर्निमेष नयनोंसे उन्हें देखता हुआ गद्गद वाणीसे स्तुति करने लगा। उस समय उसके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू उमड़ रहे थे और सारा शरीर पुलकित हो रहा था॥ २५॥

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