श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.40

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

पथि च्युतं तिष्ठति दिष्टरक्षितं

गृहे स्थितं तद्विहतं विनश्यति।

जीवत्यनाथोऽपि तदीक्षितो वने

गृहेऽपि गुप्तोऽस्य हतो न जीवति॥ ४०

pathi cyutaṃ tiṣṭhati diṣṭarakṣitaṃ

gṛhe sthitaṃ tadvihataṃ vinaśyati|

jīvatyanātho'pi tadīkṣito vane

gṛhe'pi gupto'sya hato na jīvati|| 40

अर्थ

भाग्य अनुकूल हो तो रास्तेमें गिरी हुई वस्तु भी ज्यों-की-त्यों पड़ी रहती है। परन्तु भाग्यके प्रतिकूल होनेपर घरके भीतर तिजोरीमें रखी हुई वस्तु भी खो जाती है। जीव बिना किसी सहारेके दैवकी दयादृष्टिसे जंगलमें भी बहुत दिनोंतक जीवित रहता है, परंतु दैवके विपरीत होनेपर घरमें सुरक्षित रहनेपर भी मर जाता है॥ ४०॥✎ 2019

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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