श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.65

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

आत्मजायासुतादीनामन्येषां सर्वदेहिनाम्।

यत् स्वार्थकामयोरैक्यं द्रव्याद्वैतं तदुच्यते॥ ६५

ātmajāyāsutādīnāmanyeṣāṃ sarvadehinām|

yat svārthakāmayoraikyaṃ dravyādvaitaṃ taducyate|| 65

अर्थ

स्त्री-पुत्रादि सगे-सम्बन्धी एवं संसारके अन्य समस्त प्राणियोंके तथा अपने स्वार्थ और भोग एक ही हैं, उनमें अपने और परायेका भेद नहीं है—इस प्रकारका विचार ‘द्रव्याद्वैत’ है॥ ६५॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें