श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.64

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

यद् ब्रह्मणि परे साक्षात् सर्वकर्मसमर्पणम्।

मनोवाक्तनुभिः पार्थ क्रियाद्वैतं तदुच्यते॥ ६४

yad brahmaṇi pare sākṣāt sarvakarmasamarpaṇam|

manovāktanubhiḥ pārtha kriyādvaitaṃ taducyate|| 64

अर्थ

युधिष्ठिर! मन, वाणी और शरीरसे होनेवाले सब कर्म स्वयं परब्रह्म परमात्मामें ही हो रहे हैं, उसीमें अध्यस्त हैं—इस भावसे समस्त कर्मोंको समर्पित कर देना ‘क्रियाद्वैत’ है॥ ६४॥

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