श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.22

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

असङ्कल्पाज्जयेत् कामं क्रोधं कामविवर्जनात्।

अर्थानर्थेक्षया लोभं भयं तत्त्वावमर्शनात्॥ २२

asaṅkalpājjayet kāmaṃ krodhaṃ kāmavivarjanāt|

arthānarthekṣayā lobhaṃ bhayaṃ tattvāvamarśanāt|| 22

अर्थ

धर्मराज! संकल्पोंके परित्यागसे कामको, कामनाओंके त्यागसे क्रोधको, संसारी लोग जिसे ‘अर्थ’ कहते हैं उसे अनर्थ समझकर लोभको और तत्त्वके विचारसे भयको जीत लेना चाहिये॥ २२॥

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