श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.14.5

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

यावदर्थमुपासीनो देहे गेहे च पण्डितः।

विरक्तो रक्तवत् तत्र नृलोके नरतां न्यसेत्॥ ५

yāvadarthamupāsīno dehe gehe ca paṇḍitaḥ|

virakto raktavat tatra nṛloke naratāṃ nyaset|| 5

अर्थ

बुद्धिमान् पुरुषको आवश्यकताके अनुसार ही घर और शरीरकी सेवा करनी चाहिये, अधिक नहीं। भीतरसे विरक्त रहे और बाहरसे रागीके समान लोगोंमें साधारण मनुष्यों-जैसा ही व्यवहार करे॥ ५॥

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