श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.14.38

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तेष्वेषु भगवान् राजंस्तारतम्येन वर्तते।

तस्मात् पात्रं हि पुरुषो यावानात्मा यथेयते॥ ३८

teṣveṣu bhagavān rājaṃstāratamyena vartate|

tasmāt pātraṃ hi puruṣo yāvānātmā yatheyate|| 38

अर्थ

युधिष्ठिर! एकरस रहते हुए भी भगवान् इन मनुष्यादि शरीरोंमें उनकी विभिन्‍नताके कारण न्यूनाधिकरूपसे प्रकाशमान हैं। इसलिये पशु-पक्षी आदि शरीरोंकी अपेक्षा मनुष्य ही श्रेष्ठ पात्र हैं और मनुष्योंमें भी, जिसमें भगवान्‌का अंश—तप-योगादि जितना ही अधिक पाया जाता है, वह उतना ही श्रेष्ठ है॥ ३८॥

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