श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.14.17

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

न ह्यग्‍निमुखतोऽयं वै भगवान्सर्वयज्ञभुक्।

इज्येत हविषा राजन्यथा विप्रमुखे हुतैः॥ १७

na hyagnimukhato'yaṃ vai bhagavānsarvayajñabhuk|

ijyeta haviṣā rājanyathā vipramukhe hutaiḥ|| 17

अर्थ

युधिष्ठिर! वैसे तो समस्त यज्ञोंके भोक्ता भगवान् ही हैं; परन्तु ब्राह्मणके मुखमें अर्पित किये हुए हविष्यान्‍नसे उनकी जैसी तृप्ति होती है, वैसी अग्‍निके मुखमें हवन करनेसे नहीं॥ १७॥✎ 638

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #638 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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