श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.13.38

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

श्रद्धयोपाहृतं३ क्‍वापि कदाचिन्मानवर्जितम्।

भुञ्जे भुक्‍त्वाथ कस्मिंश्चिद् दिवा नक्तं यदृच्छया॥ ३८

śraddhayopāhṛtaṃ kvāpi kadācinmānavarjitam|

bhuñje bhuktvātha kasmiṃścid divā naktaṃ yadṛcchayā|| 38

अर्थ

कभी बड़ी श्रद्धासे प्राप्त हुआ अन्‍न खाता हूँ तो कभी अपमानके साथ और किसी-किसी समय अपने-आप ही मिल जानेपर कभी दिनमें, कभी रातमें और कभी एक बार भोजन करके भी दुबारा कर लेता हूँ॥ ३८॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—योगगतं चापि।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 887)

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