श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.13.37

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

क्‍वचिदल्पं क्‍वचिद् भूरि भुञ्जेऽन्‍नं स्वाद्वस्वादु वा।

क्‍वचिद् भूरिगुणोपेतं गुणहीनमुत२ क्‍वचित्॥ ३७✎ 963

kvacidalpaṃ kvacid bhūri bhuñje'nnaṃ svādvasvādu vā|

kvacid bhūriguṇopetaṃ guṇahīnamuta kvacit|| 37

अर्थ

कभी थोड़ा अन्‍न खा लेता हूँ तो कभी बहुत; कभी स्वादिष्ट तो कभी नीरस—बेस्वाद; और कभी अनेकों गुणोंसे युक्त, तो कभी सर्वथा गुणहीन॥ ३७॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—हीनं ततः क्‍व०।

    (मुद्रित पृष्ठ 887)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #963 शब्दोंके बीचका स्थान: गुणहीनमुतक्‍वचित्॥ → गुणहीनमुत क्‍वचित्॥

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