संन्यासीको चाहिये कि वह समस्त प्राणियोंका हितैषी हो, शान्त रहे, भगवत्परायण रहे और किसीका आश्रय न लेकर अपने-आपमें ही रमे एवं अकेला ही विचरे॥ ३॥
एक एव चरेद् भिक्षुरात्मारामोऽनपाश्रयः।
सर्वभूतसुहृच्छान्तो नारायणपरायणः॥ ३
संन्यासीको चाहिये कि वह समस्त प्राणियोंका हितैषी हो, शान्त रहे, भगवत्परायण रहे और किसीका आश्रय न लेकर अपने-आपमें ही रमे एवं अकेला ही विचरे॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.13.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 883) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/13/3/