यदि वह वस्त्र पहने तो केवल कौपीन, जिससे उसके गुप्त अंग ढक जायँ। और जबतक कोई आपत्ति न आवे, तबतक दण्ड तथा अपने आश्रमके चिह्नोंके सिवा अपनी त्यागी हुई किसी भी वस्तुको ग्रहण न करे॥ २॥
बिभृयाद् यद्यसौ वासः कौपीनाच्छादनं परम्।
त्यक्तं न दण्डलिङ्गादेरन्यत् किञ्चिदनापदि॥ २
यदि वह वस्त्र पहने तो केवल कौपीन, जिससे उसके गुप्त अंग ढक जायँ। और जबतक कोई आपत्ति न आवे, तबतक दण्ड तथा अपने आश्रमके चिह्नोंके सिवा अपनी त्यागी हुई किसी भी वस्तुको ग्रहण न करे॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.13.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 883) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/13/2/