श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.12.20

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

अग्न्यर्थमेव शरणमुटजं वाद्रिकन्दराम्५।

श्रयेत हिमवाय्वग्‍निवर्षार्कातपषाट्६ स्वयम्॥ २०

agnyarthameva śaraṇamuṭajaṃ vādrikandarām|

śrayeta himavāyvagnivarṣārkātapaṣāṭ svayam|| 20

अर्थ

अग्‍निहोत्रके अग्‍निकी रक्षाके लिये ही घर, पर्णकुटी अथवा पहाड़की गुफाका आश्रय ले। स्वयं शीत, वायु, अग्‍नि, वर्षा और घामका सहन करे॥ २०॥

टिप्पणियाँ

  1. ५

    प्रा० पा०—कन्दरम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 881)
  2. ६

    प्रा० पा०—तपमाश्रयम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 881)

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