गृहं वनं वा प्रविशेत् प्रव्रजेत् तत्र वा वसेत्॥ १४
dattvā varamanujñāto guroḥ kāmaṃ yadīśvaraḥ|
gṛhaṃ vanaṃ vā praviśet pravrajet tatra vā vaset|| 14
अर्थ
फिर यदि सामर्थ्य हो तो गुरुको मुँहमाँगी दक्षिणा देनी चाहिये। इसके बाद उनकी आज्ञासे गृहस्थ, वानप्रस्थ अथवा संन्यास-आश्रममें प्रवेश करे या आजीवन ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए उसी आश्रममें रहे॥ १४॥
दत्त्वा वरमनुज्ञातो गुरोः कामं यदीश्वरः।
गृहं वनं वा प्रविशेत् प्रव्रजेत् तत्र वा वसेत्॥ १४
फिर यदि सामर्थ्य हो तो गुरुको मुँहमाँगी दक्षिणा देनी चाहिये। इसके बाद उनकी आज्ञासे गृहस्थ, वानप्रस्थ अथवा संन्यास-आश्रममें प्रवेश करे या आजीवन ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए उसी आश्रममें रहे॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.12.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 880) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/12/14/