॥ श्रीहरिः ॥
संमार्जनोपलेपाभ्यां गृहमण्डलवर्तनैः।
स्वयं च मण्डिता नित्यं परिमृष्टपरिच्छदा॥ २६
saṃmārjanopalepābhyāṃ gṛhamaṇḍalavartanaiḥ|
svayaṃ ca maṇḍitā nityaṃ parimṛṣṭaparicchadā|| 26
अर्थ
साध्वी स्त्रीको चाहिये कि झाड़ने-बुहारने, लीपने तथा चौक पूरने आदिसे घरको और मनोहर वस्त्राभूषणोंसे अपने शरीरको अलंकृत रखे। सामग्रियोंको साफ-सुथरी रखे॥ २६॥
संमार्जनोपलेपाभ्यां गृहमण्डलवर्तनैः।
स्वयं च मण्डिता नित्यं परिमृष्टपरिच्छदा॥ २६
साध्वी स्त्रीको चाहिये कि झाड़ने-बुहारने, लीपने तथा चौक पूरने आदिसे घरको और मनोहर वस्त्राभूषणोंसे अपने शरीरको अलंकृत रखे। सामग्रियोंको साफ-सुथरी रखे॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.11.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 877) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/11/26/