॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.11.18
ऋतामृताभ्यां जीवेत मृतेन प्रमृतेन वा।
सत्यानृताभ्यां जीवेत न श्ववृत्त्या कथञ्चन॥ १८
ṛtāmṛtābhyāṃ jīveta mṛtena pramṛtena vā|
satyānṛtābhyāṃ jīveta na śvavṛttyā kathañcana|| 18
अर्थ
ऋत, अमृत, मृत, प्रमृत और सत्यानृत—इनमेंसे किसी भी वृत्तिका आश्रय ले, परन्तु श्वानवृत्तिका अवलम्बन कभी न करे॥ १८॥