श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.11.17

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

जघन्यो नोत्तमां वृत्तिमनापदि भजेन्‍नरः।

ऋते राजन्यमापत्सु सर्वेषामपि सर्वशः॥ १७

jaghanyo nottamāṃ vṛttimanāpadi bhajennaraḥ|

ṛte rājanyamāpatsu sarveṣāmapi sarvaśaḥ|| 17

अर्थ

निम्नवर्णका पुरुष बिना आपत्तिकालके उत्तम वर्णकी वृत्तियोंका अवलम्बन न करे। क्षत्रिय दान लेना छोड़कर ब्राह्मणकी शेष पाँचों वृत्तियोंका अवलम्बन ले सकता है। आपत्तिकालमें सभी सब वृत्तियोंको स्वीकार कर सकते हैं॥ १७॥

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