श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.10.71

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

एवंविधान्यस्य हरेः स्वमायया

विडम्बमानस्य नृलोकमात्मनः।

वीर्याणि गीतान्यृषिभिर्जगद‍्गुरो-

र्लोकान् पुनानान्यपरं वदामि किम्॥ ७१

evaṃvidhānyasya hareḥ svamāyayā

viḍambamānasya nṛlokamātmanaḥ|

vīryāṇi gītānyṛṣibhirjagadguro-

rlokān punānānyaparaṃ vadāmi kim|| 71

अर्थ

आत्मस्वरूप जगद‍्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार अपनी मायासे जो मनुष्योंकी-सी लीलाएँ करते हैं, ऋषिलोग उन्हीं अनेकों लोकपावन लीलाओंका गान किया करते हैं। बताओ, अब मैं तुम्हें और क्या सुनाऊँ?॥ ७१॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे युधिष्ठिरनारदसंवादे
त्रिपुरविजयो नाम दशमोऽध्यायः
॥ १०॥

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