॥ श्रीहरिः ॥
देवर्षिपितृसिद्धेशा जयेति कुसुमोत्करैः।
अवाकिरञ्जगुर्हृष्टा ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ ६९
devarṣipitṛsiddheśā jayeti kusumotkaraiḥ|
avākirañjagurhṛṣṭā nanṛtuścāpsarogaṇāḥ|| 69
अर्थ
देवता, ऋषि, पितर और सिद्धेश्वर आनन्दसे जय-जयकार करते हुए पुष्पोंकी वर्षा करने लगे। अप्सराएँ नाचने और गाने लगीं॥ ६९॥
देवर्षिपितृसिद्धेशा जयेति कुसुमोत्करैः।
अवाकिरञ्जगुर्हृष्टा ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ ६९
देवता, ऋषि, पितर और सिद्धेश्वर आनन्दसे जय-जयकार करते हुए पुष्पोंकी वर्षा करने लगे। अप्सराएँ नाचने और गाने लगीं॥ ६९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.10.69 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 874) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/69/