श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.10.67

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

सन्‍नद्धो रथमास्थाय शरं धनुरुपाददे।

शरं धनुषि सन्धाय मुहूर्तेऽभिजितीश्‍वरः॥ ६७

sannaddho rathamāsthāya śaraṃ dhanurupādade|

śaraṃ dhanuṣi sandhāya muhūrte'bhijitīśvaraḥ|| 67

अर्थ

इन सामग्रियोंसे सज-धजकर भगवान् शंकर रथपर सवार हुए एवं धनुष-बाण धारण किया। भगवान् शंकरने अभिजित् मुहूर्तमें धनुषपर बाण चढ़ाया और उन तीनों दुर्भेद्य विमानोंको भस्म कर दिया। युधिष्ठिर! उसी समय स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं। सैकड़ों विमानोंकी भीड़ लग गयी॥ ६७-६८॥

यह अर्थ श्लोक 67–68 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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