श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.10.6

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अहं त्वकामस्त्वद्भक्तस्त्वं च स्वाम्यनपाश्रयः।

नान्यथेहावयोरर्थो राजसेवकयोरिव३॥ ६

ahaṃ tvakāmastvadbhaktastvaṃ ca svāmyanapāśrayaḥ|

nānyathehāvayorartho rājasevakayoriva|| 6

अर्थ

मैं आपका निष्काम सेवक हूँ और आप मेरे निरपेक्ष स्वामी हैं। जैसे राजा और उसके सेवकोंका प्रयोजनवश स्वामी-सेवकका सम्बन्ध रहता है, वैसा तो मेरा और आपका सम्बन्ध है नहीं॥ ६॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—रिह।

    (मुद्रित पृष्ठ 867)

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