श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.10.5

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

आशासानो न वै भृत्यः स्वामिन्याशिष आत्मनः।

न स्वामी भृत्यतः स्वाम्यमिच्छन् यो राति चाशिषः॥ ५

āśāsāno na vai bhṛtyaḥ svāminyāśiṣa ātmanaḥ|

na svāmī bhṛtyataḥ svāmyamicchan yo rāti cāśiṣaḥ|| 5

अर्थ

जो स्वामीसे अपनी कामनाओंकी पूर्ति चाहता है, वह सेवक नहीं; और जो सेवकसे सेवा करानेके लिये, उसका स्वामी बननेके लिये उसकी कामनाएँ पूर्ण करता है, वह स्वामी नहीं॥ ५॥

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