युधिष्ठिर! दैत्यसेनापतियोंके मनमें तीनों लोक और लोकपतियोंके प्रति वैरभाव तो था ही, अब उसकी याद करके उन तीनों विमानोंके द्वारा वे उनमें छिपे रहकर सबका नाश करने लगे॥ ५५॥
ताभिस्तेऽसुरसेनान्यो लोकांस्त्रीन् सेश्वरान् नृप।
स्मरन्तो नाशयाञ्चक्रुः पूर्ववैरमलक्षिताः॥ ५५
युधिष्ठिर! दैत्यसेनापतियोंके मनमें तीनों लोक और लोकपतियोंके प्रति वैरभाव तो था ही, अब उसकी याद करके उन तीनों विमानोंके द्वारा वे उनमें छिपे रहकर सबका नाश करने लगे॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.10.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 873) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/55/