श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.10.55

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

ताभिस्तेऽसुरसेनान्यो लोकांस्त्रीन् सेश्‍वरान् नृप।

स्मरन्तो नाशयाञ्चक्रुः पूर्ववैरमलक्षिताः॥ ५५

tābhiste'surasenānyo lokāṃstrīn seśvarān nṛpa|

smaranto nāśayāñcakruḥ pūrvavairamalakṣitāḥ|| 55

अर्थ

युधिष्ठिर! दैत्यसेनापतियोंके मनमें तीनों लोक और लोकपतियोंके प्रति वैरभाव तो था ही, अब उसकी याद करके उन तीनों विमानोंके द्वारा वे उनमें छिपे रहकर सबका नाश करने लगे॥ ५५॥

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