॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.10.44
सर्गस्थित्यप्ययेशस्य गुणकर्मानुवर्णनम्।
परावरेषां स्थानानां कालेन व्यत्ययो महान्॥ ४४
sargasthityapyayeśasya guṇakarmānuvarṇanam|
parāvareṣāṃ sthānānāṃ kālena vyatyayo mahān|| 44
अर्थ
इस प्रसंगमें भगवान्के परम भक्त प्रह्लादका चरित्र, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य एवं संसारकी सृष्टि, स्थिति और प्रलयके स्वामी श्रीहरिके यथार्थ स्वरूप तथा उनके दिव्य गुण एवं लीलाओंका वर्णन है। इस आख्यानमें देवता और दैत्योंके पदोंमें कालक्रमसे जो महान् परिवर्तन होता है, उसका भी निरूपण किया गया है॥ ४३-४४॥✎ 631