श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.37

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

अशपन् कुपिता एवं युवां वासं न चार्हथः।

रजस्तमोभ्यां रहिते पादमूले मधुद्विषः।

पापिष्ठामासुरीं योनिं बालिशौ यातमाश्‍वतः॥ ३७

aśapan kupitā evaṃ yuvāṃ vāsaṃ na cārhathaḥ|

rajastamobhyāṃ rahite pādamūle madhudviṣaḥ|

pāpiṣṭhāmāsurīṃ yoniṃ bāliśau yātamāśvataḥ|| 37

अर्थ

इसपर वे क्रोधित-से हो गये और उन्होंने द्वारपालोंको यह शाप दिया कि ‘मूर्खो! भगवान् विष्णुके चरण तो रजोगुण और तमोगुणसे रहित हैं। तुम दोनों इनके समीप निवास करनेयोग्य नहीं हो। इसलिये शीघ्र ही तुम यहाँसे पापमयी असुरयोनिमें जाओ’॥ ३७॥

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