श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.33

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

युधिष्ठिर उवाच

कीदृशः कस्य वा शापो हरिदासाभिमर्शनः।

अश्रद्धेय इवाभाति हरेरेकान्तिनां भवः॥ ३३

kīdṛśaḥ kasya vā śāpo haridāsābhimarśanaḥ|

aśraddheya ivābhāti harerekāntināṃ bhavaḥ|| 33

अर्थ

राजा युधिष्ठिरने पूछा—नारदजी! भगवान्‌के पार्षदोंको भी प्रभावित करनेवाला वह शाप किसने दिया था तथा वह कैसा था? भगवान्‌के अनन्य प्रेमी फिर जन्म-मृत्युमय संसारमें आयें, यह बात तो कुछ अविश्‍वसनीय-सी मालूम पड़ती है॥ ३३॥

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