श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.2

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

न ह्यस्यार्थः सुरगणैः साक्षान्‍निःश्रेयसात्मनः।

नैवासुरेभ्यो विद्वेषो नोद्वेगश्चागुणस्य हि॥ २

na hyasyārthaḥ suragaṇaiḥ sākṣānniḥśreyasātmanaḥ|

naivāsurebhyo vidveṣo nodvegaścāguṇasya hi|| 2

अर्थ

वे स्वयं परिपूर्ण कल्याणस्वरूप हैं, इसीलिये उन्हें देवताओंसे कुछ लेना-देना नहीं है। तथा निर्गुण होनेके कारण दैत्योंसे कुछ वैर-विरोध और उद्वेग भी नहीं है॥ २॥

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