श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.49

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

न वेद कृपणः श्रेय आत्मनो गुणवस्तुदृक्।

तस्य तानिच्छतो यच्छेद् यदि सोऽपि तथाविधः॥ ४९

na veda kṛpaṇaḥ śreya ātmano guṇavastudṛk|

tasya tānicchato yacched yadi so'pi tathāvidhaḥ|| 49

अर्थ

जो पुरुष जगत‍्के विषयोंको सत्य समझता है, वह नासमझ अपने वास्तविक कल्याणको नहीं जानता। यही कारण है कि वह विषय चाहता है; परन्तु यदि कोई जानकार उसे उसकी इच्छित वस्तु दे देता है, तो वह भी वैसा ही नासमझ है॥ ४९॥

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