देवशिरोमणियो! मेरे प्रसन्न हो जानेपर कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रह जाती। तथापि मेरे अनन्यप्रेमी तत्त्ववेत्ता भक्त मुझसे मेरे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं चाहते॥ ४८॥✎ 523
किं दुरापं मयि प्रीते तथापि विबुधर्षभाः।
मय्येकान्तमतिर्नान्यन्मत्तो वाञ्छति तत्त्ववित्॥ ४८
देवशिरोमणियो! मेरे प्रसन्न हो जानेपर कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रह जाती। तथापि मेरे अनन्यप्रेमी तत्त्ववेत्ता भक्त मुझसे मेरे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं चाहते॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.9.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 751) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/9/48/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#523 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने