श्रीभगवान्ने कहा—श्रेष्ठ देवताओ! तुमलोगोंने स्तुतियुक्त ज्ञानसे मेरी उपासना की है, इससे मैं तुमलोगोंपर प्रसन्न हूँ। इस स्तुतिके द्वारा जीवोंको अपने वास्तविक स्वरूपकी स्मृति और मेरी भक्ति प्राप्त होती है॥ ४७॥✎ 523
प्रीतोऽहं वः सुरश्रेष्ठा मदुपस्थानविद्यया।
आत्मैश्वर्यस्मृतिः पुंसां भक्तिश्चैव यया मयि॥ ४७
श्रीभगवान्ने कहा—श्रेष्ठ देवताओ! तुमलोगोंने स्तुतियुक्त ज्ञानसे मेरी उपासना की है, इससे मैं तुमलोगोंपर प्रसन्न हूँ। इस स्तुतिके द्वारा जीवोंको अपने वास्तविक स्वरूपकी स्मृति और मेरी भक्ति प्राप्त होती है॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.9.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 751) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/9/47/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#523 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने